छत्तीसगढ़

अपेक्स बैंक के अध्यक्ष का आदेश कूड़ेदान में…. केदार गुप्ता Vs सिस्टम…कहा प्रमोशन करो…कमेटी ने कहा – हम आपके हैं कौन ? निज सचिव की भूमिका पर सवाल…

रायपुर 29 सितंबर । छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी बैंक मर्यादित में प्राधिकृत अधिकारी के आदेश का कितना वजन है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रमोशन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बनी कमेटी ने आदेश जारी होने के 65 दिन बाद भी एक भी बैठक नहीं की है। बैंक के गलियारों में इसे लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति बताया जा रहा है। चर्चा है कि ये सब उसी पहली बोर्ड मीटिंग का साइड इफेक्ट है, जहां प्राधिकृत अधिकारी केदार गुप्ता ने अधिकारियों की जुगलबंदी पकड़ ली थी।

कागज में बनी कमेटी, हकीकत में कुंभकर्णी नींद :-

आदेश 27.07.2026  तत्कालीन  प्रबंध संचालक के.एन. कांडे के हस्ताक्षर से जारी हुआ था। आदेश में साफ-साफ लिखा था – बैंक सेवायुक्तों के अभ्यावेदन पर और बोर्ड बैठक 24.06.2026 के विषय क्रमांक 43 के परिपालन में तत्काल कमेटी बनाकर लेखाधिकारी और सहायक प्रबंधक के स्टाफिंग पैटर्न में संशोधन और पात्र कर्मचारियों को पदोन्नति पर शीघ्र रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

इस आदेश पर भूपेश चंद्रवंशी को अध्यक्ष, रीतेश सोनी को संयोजक और एल.के. चौधरी व ए.के. लहरे को सदस्य बनाया गया।

अध्यक्ष का निर्देश :-

लेकिन  बिलासपुर संभाग के एक सूत्र  का दावा है कि 27 जुलाई से आज 29 सितंबर तक इस कमेटी की एक भी बैठक नहीं हुई है। न स्टाफिंग पैटर्न पर चर्चा, न पात्रता पर विचार, न कोई प्रोसेस, न कोई रिपोर्ट। अध्यक्ष का निर्देश, बोर्ड का प्रस्ताव और  तत्कालीन  प्रबंध संचालक का आदेश सब कुछ सिर्फ कागजों में कैद है।

पहली बोर्ड मीटिंग में क्या हुआ था ?

ब्रांच सूत्र ने यह भी बताया हैं कि केदार गुप्ता की पहली ही बोर्ड मीटिंग में सारे अधिकारी एकजुट होकर एक बड़े प्रकरण को अपनी ही झुंड में निपटाना चाहते थे। एक ऐसा एजेंडा जो बोर्ड के सामने रखा ही नहीं जाना था, उसे चुपचाप निपटाने की तैयारी थी।

प्राधिकृत अधिकारी हर मोर्चे पर फेल :-

लेकिन खेल उल्टा पड़ गया। बताया जाता है कि गुप्ता को भनक लग गई और उन्होंने बोर्ड में ही उस एजेंडे को पढ़ दिया जो टेबल पर रखा ही नहीं गया था। इस पर वे जमकर बरसे। उस दौरान उन्होंने अपने निज सचिव पर भी कड़ी नाराजगी जताई थी कि जब एजेंडा बोर्ड में नहीं है तो उसकी जानकारी अध्यक्ष तक क्यों नहीं पहुंची?

चर्चा है कि उसी दिन से अधिकारियों के एक धड़े ने तय कर लिया था कि प्राधिकृत अधिकारी को हर मोर्चे पर फेल दिखाना है।

सबसे बड़ा सवाल – निज सचिव कर क्या रहे हैं ?

इस पूरे खेल में सबसे संदिग्ध भूमिका प्राधिकृत अधिकारी के निज सचिव की बताई जा रही है। आदेश की प्रति में दूसरे नंबर पर ही उनका नाम है – “निज सचिव, प्राधिकृत अधिकारी को पालनार्थ”।

नियम कहता है कि सचिव का काम है अध्यक्ष के हर काम – पार्टी, प्रशासन, बैंकिंग – की छोटी-बड़ी अपडेट अध्यक्ष के संज्ञान में लाना। कमेटी बनी या नहीं, मीटिंग हुई या नहीं, फाइल कहां अटकी है, ये बताना उनकी पहली जिम्मेदारी  है

पहली बार एजेंडा ही गायब :-

सवाल यही है कि जब पहली बार एजेंडा ही गायब कर दिया गया था, तब तो केदार गुप्ता खुद सतर्क हो गए थे, लेकिन अब जब प्रमोशन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर 65 दिन से फाइल नहीं हिली, तो सचिव ने अध्यक्ष को अवगत क्यों नहीं कराया कि आपके आदेश पर बनी कमेटी ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया है ?

उपलब्धियों की लिस्ट में कुछ नहीं :-

बैंक के भीतर चर्चा तेज है कि ये 5 सदस्य मिलकर प्राधिकृत अधिकारी को यही संदेश देना चाहते हैं कि कमेटी बनती रहेगी, लेकिन इससे आपकी उपलब्धियों की लिस्ट में कुछ नहीं जुड़ेगा।

टकटकी लगाए बैठे हैं कर्मचारी :-

लंबे अरसे बाद कर्मचारियों में प्रमोशन को लेकर उम्मीद जगी थी कि केदार गुप्ता के आने से कुछ होगा। अब वो टकटकी लगाए बैठे हैं और कमेटी कुंभकर्णी नींद में है।

पुराने दौर में जब   तत्कालीन  प्रबंध संचालक की अपनी चौकड़ी हुआ करती थी, तब ऐसे ही आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता था। कर्मचारी अब पूछ रहे हैं – क्या फिर वही खेल दोहराया जा रहा है? क्या जानबूझकर केदार गुप्ता की छवि को रोकने के लिए प्रमोशन फाइल को लटकाया जा रहा है

Related Articles

Back to top button