चली ऐसी गहरी चाल…. सत्ता हारी, समाज जीता… परमानंद नहीं संतोष!

रायपुर। जिसका मुझे था इंतजार वो घड़ी आ गई…जी हां, किशोर कुमार का ये सदाबहार गाना आज छत्तीसगढ़ के यादव ठेठवार समाज पर बिल्कुल सटीक बैठता है। 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के दिन, जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था, वो घड़ी आखिर आ ही गई। और इस घड़ी ने वो किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ये सिर्फ प्रांत अध्यक्ष का चुनाव नहीं था, ये छत्तीसगढ़ के यादव ठेठवार समाज के आत्मसम्मान का चुनाव था। जो राजीम स्थित मुख्यालय में संपन्न हुआ
दो चेहरे, दो सोच, एक कुर्सी :-
मैदान में कई दावेदार थे, लेकिन असली लड़ाई दो लोगों के बीच सिमट गई थी। एक तरफ थे परमानंद यादव – जिनके बारे में खुलेआम चर्चा थी कि वो शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के सबसे करीबी, सबसे विश्वासपात्र हैं। कहा जा रहा था कि पूरी फील्डिंग गजेंद्र यादव खुद कर रहे हैं। सत्ता, संपर्क, पहुँच सब कुछ उनके साथ था। शुरू में तो लोग यही कह रहे थे – “जीत तो परमानंद की पक्की है, उनकी पहुँच अंतिम व्यक्ति तक है।”
दूसरी तरफ थे संतोष यदु – संगठन का वो चेहरा जिसके पास बैनर नहीं, विजन था। जिसके पास सत्ता की हनक नहीं, समाज को जोड़ने की बात थी। और यहीं पर खेल पलट गया। वो एक लाइन जिसने हवा का रुख बदल दिया
चुनाव की घोषणा होते ही बाजार गर्म था। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा था। समाज के एक बड़े वर्ग में नाराजगी थी कि – “क्या प्रांत अध्यक्ष का चुनाव भी सत्ता के इशारे पर होगा?”
एक लाइन चिंगारी बन गई :-
इसी बीच वो किस्सा हुआ जिसने पूरा चुनाव पलट दिया। बताया जा रहा है कि समाज के कुछ वरिष्ठ लोग जब अपनी बात लेकर गजेंद्र यादव से मिलने गए, तो जवाब मिला – “मुझे समाज से कोई मतलब नहीं है।” बस… ये एक लाइन चिंगारी बन गई। समाज के लोगों ने सोचा – हमें वो नेता चाहिए जो राजनीति में अपना उल्लू सीधा करे, या वो बेटा चाहिए जो समाज को मजबूत करे? समाज आज भी विसंगतियों से जूझ रहा है, उसे विकास की बात करने वाला चाहिए, सत्ता की बात करने वाला नहीं।
शतरंज की वो चाल :-
संतोष यदु ने इसी नब्ज को पकड़ लिया। उन्होंने शतरंज की वो चाल चली, जिसका कोई तोड़ नहीं था। उन्होंने हर मोहरे का सही इस्तेमाल किया। वो अंतिम व्यक्ति तक गए, अपनी योजना बताई, अपनी दूरदृष्टि समझाई। लोगों को लगा – ये आदमी अध्यक्ष बनने नहीं, समाज बनाने आया है।
और नतीजा? कड़ी गहमा-गहमी के बीच बाजी पलट गई। जिसे सब हारा हुआ मान रहे थे, वही जीत गया।
बंद कमरे से खुले मंच तक का सफर :-
समाज के बुजुर्ग आज एक बात कह कर भावुक हो रहे हैं। वो कहते हैं – “पहले क्या होता था? बंद कमरे में 4 लोग बैठते थे और प्रांत अध्यक्ष चुन लेते थे। समाज को पता भी नहीं चलता था कि अध्यक्ष कौन है और आज?
गांव-गांव में हुई चर्चा :-
विधानसभा स्तर तक चुनाव हुआ। बड़े-बड़े बैनर लगे, पोस्टर लगे, गांव-गांव में चर्चा हुई। ये चुनाव नहीं, ये यादव ठेठवार समाज के जागने का उत्सव था। इस चुनाव ने बता दिया है कि छत्तीसगढ़ का यादव ठेठवार समाज अब जाग गया है। अब वो बंद कमरे का अध्यक्ष नहीं, खुले मंच का नेता चाहता है। अब वो पूछता है, परखता है, और फिर चुनता है।
संतोष यदु की ये जीत सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं है। ये उस सोच की जीत है जो कहती है – समाज बड़ा है, सत्ता नहीं। आने वाले समय में भीड़ और भी बड़ी होगी, चर्चा और भी तेज होगी, क्योंकि अब समाज ने लोकतंत्र का स्वाद चख लिया है
वोटों का गणित – पर्ची से खुला राज :-
बंद कमरे से निकलकर पहली बार विधानसभा स्तर तक हुए इस ऐतिहासिक चुनाव में कुल 426 वोट पड़े।
1. संतोष यदु – 194 वोट (प्रचंड जीत)
2. परमानंद यादव – 108 वोट
3. दुलेश यादव – 54 वोट
4. कौशल यादव – 37 वोट
5. खेमराज यादव – 33 वोट
जिसे सब हारा हुआ मान रहे थे, वो 86 वोटों के बड़े अंतर से जीत गया।




