दिल्ली में पुरस्कार…छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना वेंटिलेटर पर ! आंकड़ों का खेल? राष्ट्रीय सम्मान की चमक के पीछे …

रायपुर, 25 सितंबर । एक तरफ विज्ञान भवन, दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा छत्तीसगढ़ को आयुष्मान भारत में पोर्टेबिलिटी क्लेम्स के समयबद्ध निराकरण के लिए राष्ट्रीय सम्मान दे रहे हैं, और राज्य नोडल अधिकारी डॉ. धर्मेंद्र गहवई ट्रॉफी ले रहे हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।
सरकार “स्वास्थ्य सुरक्षा से जनकल्याण” का ढोल पीट रही है, लेकिन सवाल यह है कि यह सम्मान किस आधार पर मिला?
सम्मान कैसे मिलता है?
केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा भेजे गए डेटा और क्लेम प्रोसेसिंग की रिपोर्ट के आधार पर यह पुरस्कार देती है। विभाग जो डेटा दिल्ली भेजता है, उसी के आधार पर प्रेजेंटेशन बनता है और ट्रॉफी मिल जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में आयुष्मान की हालत किसी से छिपी नहीं है।
जमीनी सच्चाई ये है:-
छह महीने से पैसा नहीं, अस्पतालों ने खींचे हाथ:
प्रदेश के सैकड़ों निजी अस्पतालों ने आयुष्मान में इलाज देना लगभग बंद कर दिया है। कारण – 6 महीने से ज्यादा समय से क्लेम की राशि अटकी पड़ी है। अस्पताल कह रहे हैं – सरकार पैसा नहीं दे रही तो इलाज कैसे दें? इसका खामियाजा गरीब मरीज भुगत रहा है।
मुख्यमंत्री विशेष सहायता योजना भी ढकोसला:-
जिस योजना को गरीबों के लिए संजीवनी बताया जा रहा है, वो फाइलों में उलझी है। मरीज दर-दर भटक रहा है, अफसर टालमटोल कर रहे हैं। वहीं अगर मुख्यमंत्री विशेष सहायता योजना के तहत पैसा स्वीकृत हो भी जाता है तो भी अस्पताल वाले नहीं मानते कहते हैं पूरा बिल पेमेंट करना पड़ेगा हमें बहुत सालों बाद पैसा मिलता है जब की उस पत्र में लिखा होता है की कोई भी राशि न लिया जाए ॥ उसके बावजूद रकम देनी पड़ती है और सरकार देखते रहती है ।
मंत्री के बंगले में बैठा ‘प्राइवेट सिस्टम’ :-
चर्चा तो यह भी गर्म है कि आज प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में असली फैसले मंत्री-आईएएस नहीं, बल्कि मंत्री कार्यालय में बैठा एक व्यक्ति ले रहा है। आरोप है कि आधे से ज्यादा बड़े अस्पतालों से वसूली का पैसा पहुंच रहा है। इसी वजह से विभाग में हड़कंप और अफरा-तफरी मची हुई है। क्या स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को इस ‘सुपर पावर’ की खबर नहीं है?
वेंटिलेटर पर मरीज, जेब पर डाका – विधानसभा में बोले :-
सबसे शर्मनाक तस्वीर अस्पतालों के अंदर की है।
गरीब आदमी अपना खेत, घर, जेवर बेचने को मजबूर है। डॉक्टर ICU में भर्ती मरीज के शरीर में नली-वेंटिलेटर लगाकर परिजनों को डराते हैं और फिर कहते हैं – “ये पैकेज आयुष्मान में नहीं है, 50 हजार-1 लाख कैश लाओ तो जान बचेगी।” मजबूर परिवार जान बचाने के लिए कर्ज ले रहा है, जबकि सरकार कह रही है इलाज फ्री है।
इसी विधानसभा सत्र में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने खुद सदन में कहा था – “अगर कोई भी अस्पताल आयुष्मान का मरीज लेने से मना करेगा या एक रुपया भी लेगा, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करूंगा।”
लेकिन हकीकत? कार्रवाई शून्य है। बयानबाजी फुल है। रोज सैकड़ों शिकायतें आ रही हैं, पर एक भी बड़े अस्पताल का लाइसेंस रद्द नहीं हुआ।
सवाल सरकार से :-
जब प्रदेश के अस्पताल ही इलाज नहीं दे रहे, तो दिल्ली में मिला पोर्टेबिलिटी का सम्मान किस काम का? बाहर इलाज लेने वाले छत्तीसगढ़ियों का क्लेम तो आपने निपटा दिया, पर प्रदेश के अंदर मर रहे गरीब का क्या? जब 29.05 लाख पोर्टेबिलिटी क्लेम पर 8383 करोड़ केंद्र ने दिया, तो छत्तीसगढ़ के अस्पतालों का 6 महीने का पैसा कहां अटका है? मंत्री के कार्यालय में बैठे व्यक्ति की भूमिका की जांच कौन करेगा?
राष्ट्रीय सम्मान अच्छी बात है, लेकिन सम्मान से पेट नहीं भरता, सम्मान से गरीब की जान नहीं बचती। सरकार को प्रचार की चमक-दमक से निकलकर अस्पतालों के बकाया भुगतान, निजी वसूली तंत्र और वेंटिलेटर के नाम पर हो रही खुली लूट पर ध्यान देना होगा।
नहीं तो यह नारा – “स्वास्थ्य सुरक्षा से जनकल्याण” नहीं, “आंकड़ों की सुरक्षा से सरकार का कल्याण” बनकर रह जाएगा।



