सहकारिता बैंक में कुर्सी है… ताकत नहीं – उपाध्यक्ष सिर्फ नाम के ?

रायपुर 4 सितंबर ।छत्तीसगढ़ में चुनाव को सामने देख भाजपा संगठन लगातार बैठकें ले रहा है। मंडल से लेकर मंत्रिमंडल तक कार्यकर्ताओं से सीधा सवाल पूछा जा रहा है किसने क्या काम किया है? और इसी पूछताछ में बवाल मच गया है। कार्यकर्ता अब खुलकर विरोध पर उतर आए हैं। बैठकों में सीधा मंत्रियों के खिलाफ बोला जा रहा है। आरोप एक ही है – मंत्री तवज’ नहीं दे रहे। कार्यकर्ता की सुनते ही नहीं।
उपाध्यक्ष सिर्फ शो-पीस :-
ठीक यही ‘तवज्जो ‘ वाला रोग अब जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों (DCCB) में भी फैल गया है। जैसा मंत्री, वैसा ही बैंक का अध्यक्ष। अध्यक्ष का एकतरफ़ा राज, उपाध्यक्ष सिर्फ शो-पीस । सूत्र बताते हैं कि DCCB में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के बीच कुआं-खाई बन गई है। अध्यक्ष अपने उपाध्यक्ष को जरा भी तवज्जो नहीं दे रहे। न फाइल देखते हैं, न बैठक में पूछते हैं।
संगठन में एक आंतरिक रिपोर्ट :-
इस अंदरूनी घमासान की चर्चा अब खाने की टेबल से लेकर संगठन की बंद कमरे की बैठकों तक पहुंच गई है। मामला संगठन तक रख दिया गया है। सबसे ज्यादा चर्चा राजधानी के जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष को लेकर है। उनके खिलाफ तो संगठन में एक आंतरिक रिपोर्ट तक दे दी गई है।
रिपोर्ट में दो बड़ी बातें कही गई हैं –
1. अध्यक्ष एकतार चलाते हैं । बैंक में किसी से सलाह-मशविरा नहीं। खुद ही सब फैसले लेते हैं।
2. बैंक को चला नहीं पा रहे: – आरोप है कि असल में अध्यक्ष बैंक को नहीं, बल्कि बैंक प्रशासन अध्यक्ष को चला रहा है। वो बैंक चलाने में सक्षम ही नहीं हैं।यानी कुर्सी अध्यक्ष की, रिमोट प्रशासन के हाथ में।
क्यों भड़के हैं दिग्गज ? ऑप्शन वाले पद पर :-
दरअसल DCCB का उपाध्यक्ष पद मानसेवी है, कोई नौकरी नहीं। अधिनियम 1960 की धारा 49(8) के तहत मनोनयन होता है। न सैलरी, न बंगला, न गाड़ी। बैठक भत्ता 1000-2000 रुपये। लेकिन इस ‘ऑप्शन’ वाले पद पर भाजपा के दशकों पुराने दिग्गजों को बैठा दिया गया। राजनांदगांव, दुर्ग और रायपुर में अनिमेष कश्यप जैसे कद्दावर नेता, जिन्हें अध्यक्ष बनना था, उन्हें उपाध्यक्ष बनाकर साइडलाइन कर दिया। ‘ अनुभवी’ जैसे जमीनी नेताओं के साथ भी यही हुआ। अब जब अध्यक्ष ही उन्हें ‘मस्ट लाइट’ कर रहे हैं, तो दर्द तो होगा ही।
चुनाव से पहले विस्फोटक तय ?
अंदरखाने सभी उपाध्यक्ष एकजुट हो रहे हैं। तैयारी सहकारिता मंत्री और मुख्यमंत्री से मिलने की है। उनकी मांग साफ है – 25 से 40 हजार मानदेय, वाहन-सहायक और कार्यकाल की सुरक्षा। संगठन भी समझ रहा है कि अगर कार्यकर्ताओं और इन सीनियर नेताओं की नाराजगी ऐसे ही रही, तो चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। मंत्री कार्यकर्ता को तवज्जो नहीं दे रहे, अध्यक्ष उपाध्यक्ष को नहीं दे रहे – ये मैसेज नीचे तक गलत जा रहा है।
सीधे संगठन और सरकार :-
फिलहाल शासन चुप है, लेकिन रायपुर DCCB की रिपोर्ट के बाद इतना तय है – सहकारिता बैंकों की ये लड़ाई अब बैंक की चारदीवारी से निकलकर सीधे संगठन और सरकार के दरवाजे पर पहुंच गई है।




