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महासभा में महासंग्राम…. प्रांत की कुर्सी पर किसका राजतिलक? चुनाव में बड़ा टकराव – मंत्री vs समाज

!रायपुर । यादव ठेठवार समाज महासभा छत्तीसगढ़। के चुनाव को लेकर अभी तक आधिकारिक तारीख का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन इतना तय है कि चुनाव इसी साल होगा। चुनाव का साल फाइनल होते ही समाज के भीतर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है।
लड़ने वालों की अंतिम संख्या तो अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन चार प्रमुख चेहरे ऐसे हैं जिन पर समाज की नजर टिकी है और जो लगातार प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं। इस बार चुनाव कई मायनों में अलग और निर्णायक माना जा रहा है, क्योंकि पहले जहां बंद कमरे में अध्यक्ष तय हो जाता था, वहीं अब युवा, जागरूक वर्ग और महिलाओं की बड़ी भागीदारी से समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।

1) युवा प्रकोष्ठ की कमान :-

इस प्रचार के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है – परमानंद यादव का, जो वर्तमान में युवा प्रकोष्ठ की कमान संभाले हुए हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने समाज को जोड़ने के लिए कुछ सफल आयोजन किए हैं, जिसमें ‘समरसता यात्रा’ जैसे कार्यक्रमों को गिनाया जा सकता है। एक वर्ग में उनका झुकाव भी देखा जा रहा है।
लेकिन सबसे बड़ी बात जिस पर समाज में काफ़ी रोष है, वो है वर्तमान कैबिनेट मंत्री गजेंद्र यादव का उन्हें खुला समर्थन। चर्चा है कि प्रचार के लिए गाड़ी से लेकर अन्य संसाधनों कि मदद भी पहुंचाई जा रही है। समाज के लोगों का कहना है कि बाकी प्रत्याशी भी तो समाज के ही हैं, फिर एक के लिए मंत्री का इस तरह सामने आना ठीक नहीं है।
यह भी देखने में आया है कि प्रचार -प्रसार के दौरान मंत्री  गजेंद्र यादव के ख़िलाफ़ काफ़ी रोष देखने को मिला।। लोगों का कहना है कि समाज में वर्तमान कैबिनेट मंत्री गजेंद्र यादव अपनी वो छवि नहीं बना सके जो समाज में बनाने चाहिए जो पूर्व मंत्री हेमचंद यादव,  पूर्व विधायक लोकेंद्र यादव,  वर्तमान महापौर पूर्व संसद मधुसूदन यादव का समाज में बना है । मधुसूदन के पास प्रदेश का कोई भी व्यक्तिगत चला जाए तो ख़ाली हाथ नहीं आता और सम्मान के साथ उनके पूछ परख होती है जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में है ।

यहां तक कि दूर-दराज के जिलों में प्रचार के दौरान यादव समाज के लोग मजबूरी में पोस्टर पर गजेंद्र यादव का फोटो तो लगा रहे हैं, लेकिन चेहरे के भाव कुछ और ही बयां करते हैं। वही दुर्ग जिले के यादव समाज के लोग अपने चेहरे पर गजेंद्र यादव का मुखौटा जरूर लगाएं हैं लेकिन मुखौटा के पीछे का चेहरा यह बता देता है की वास्तव में स्थिति क्या है।

2)। राज  के अध्यक्ष :-

दूसरे बड़े चेहरे के रूप में संतोष यादव हैं, जो ग्राम सलोनी के पूर्व सरपंच रहे हैं। वे भी चुनाव जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और लगातार जनसंपर्क में लगे हैं। राज स्तर पर मिली जिम्मेदारी के दौरान उनके कार्यालय और कार्यों को बेहतर बताया जाता है। ग्रामीण पकड़ और संतुलित छवि उनकी ताकत मानी जा रही है। लेकिन फिर भी संतोष पर भरोसा नहीं किया जा रहा है की आख़िर में अगर अध्यक्ष का ताज संतोष को पहनाया जाए तो क्या वह समाज को गति दे पाएंगे जो समाज चाहता है समाज में कई माँग प्रमुख है क्या उस पर विचार हो पाएगा आदि जैसी तमाम मांगे है । हालांकि प्रचार प्रसार के दौरान अपना उद्देश्य पारदर्शिता के साथ समाज प्रमुखों के बीच रख रहे हैं और कड़ी मेहनत के मध्यम से इस चुनाव में जितने का प्रयास कर रहे हैं ।

3)  अनुभवी खिलाड़ी की दावेदारी :-

तीसरे प्रमुख नाम प्रहलाद यादव हैं। संघर्ष से निकले और राजनीति के उतार-चढ़ाव देख चुके प्रहलाद यादव की ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ है। वे भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के लिए पूरी तरह सक्रिय हैं। समाज का एक धड़ा उन पर विश्वास जता रहा है लेकिन कहीं ना कहीं पुराना इतिहास भी खंगाला जा रहा है । (जोहत एंड कंपनी )

4 ) वर्तमान प्रांतअध्यक्ष :-

इन तीनों के बीच एक चौथा नाम भी तेजी से उभर रहा है – वर्तमान प्रांताध्यक्ष और मजदूरों के नेता के रूप में पहचाने जाने वाले चेहरे का गुलेंद यादव हालांकि प्रदेश स्तर पर उनका नाम उतना चर्चित नहीं रहा है, लेकिन उनके कार्यों को सराहा जा रहा है। समाज में उन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जाने वाला एक बड़ा वर्ग समर्थन दे रहा है, इसलिए उन्हें भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। हालाकि उनके ही कुछ समर्थक नहीं चाहते की वो चुनाव लड़े । और उन्हें लड़ना भी नहीं चाहिए उन्होंने पाँच साल में जो कार्य किया वो बेहतर किया और आगे की ज़िम्मेदारी नए चेहरे को मिलनी चाहिए मतलब हर पाँच साल में एक नवा चेहरा समाज को मिलना चाहिए ।

समाज की आवाज – पार्टी नहीं, समाज का विकास चाहिए :-

फिलहाल समाज में एक ही मांग गूंज रही है – अध्यक्ष ऐसा हो जो पार्टी से ऊपर उठकर सोचे।
नई राजधानी में आज तक समाज के लिए जमीन की व्यवस्था न हो पाना और दुर्ग जैसे जिले में बैठक के लिए दूसरे समाज के भवन का सहारा लेना पड़ा, जहां ‘जय यादव, जय माधव’ के नारे गूंजे – यह टीस आज भी समाज के मन में है।

यादव समाज अब किसी का मोहरा नहीं बनना चाहता। उसे ऐसा नेतृत्व चाहिए जो सरकार और पार्टी के सामने समाज के हक की बात मजबूती से रख सके।
अब देखना होगा कि चुनाव किस मोड़ पर जाता है और यादव महासभा के प्रांत की कुर्सी पर कौन बैठता है।

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