आंजनेय यूनिवर्सिटी में ..,सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर…विमर्श सत्र आयोजित…

रायपुर। आंजनेय विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक मार्क्सवाद अध्ययन केंद्र, रायपुर द्वारा Cultural Marxism के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन एवं विमर्श सत्र का आयोजन किया गया। सत्र में सांस्कृतिक बदलाव, शिक्षा, मीडिया, फिल्म, वेब सीरीज और OTT प्लेटफॉर्म की भूमिका सहित समकालीन सामाजिक एवं वैचारिक विषयों पर गहन चर्चा हुई।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख एवं प्रचारक श्री कैलाशचंद्र जी तथा मध्य क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य एवं प्रचारक श्री विश्वजीत जी उपस्थित रहे। इस अवसर पर प्रांत प्रचार प्रमुख श्री संजय तिवारी जी, राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा, आंजनेय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री अभिषेक अग्रवाल, दिव्या अग्रवाल, वाइस चांसलर टी. रामाराव तथा रजिस्ट्रार रूपाली चौधरी भी मौजूद रहीं।
सत्र को संबोधित करते हुए श्री कैलाश चंद्र जी ने कहा कि वर्तमान समय में विचारों और सामाजिक धारणाओं के निर्माण में मीडिया और नैरेटिव की महत्वपूर्ण भूमिका है। बाजार के निर्माण में भी संस्कृति और नैरेटिव की भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि Cultural Marxism को समझने के लिए उसके अकादमिक स्रोतों और वैचारिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। उन्होंने इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वैश्विक बाजार शक्तियों तथा भारतीय समाज की पारिवारिक एवं सांस्कृतिक संरचना पर इसके संभावित प्रभावों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था, अकादमिक पाठ्यक्रमों और मनोरंजन माध्यमों के जरिए सामाजिक एवं सांस्कृतिक विमर्श का निर्माण होता है। जो विचार अकादमिक संस्थानों में पढ़ाया जाता है, वही धीरे-धीरे समाज के नैरेटिव का हिस्सा बनता है। भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत उसका परिवार और उसकी पारिवारिक मूल्य-व्यवस्था है।
विश्वजीत जी ने कहा कि आधुनिक वैचारिक संघर्ष केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक संस्थाओं में भी इसके विभिन्न आयाम दिखाई देते हैं। सत्र के दौरान इटली के विचारक एंटोनियो ग्राम्शी के Cultural Hegemony (सांस्कृतिक वर्चस्व) के सिद्धांत तथा फ्रैंकफर्ट स्कूल के प्रमुख चिंतकों मैक्स होर्खाइमर, थियोडोर अडोर्नो एवं हर्बर्ट मार्क्यूज़ के विचारों पर चर्चा की गई। भारतीय चिंतन परंपरा में काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष की अवधारणा तथा पश्चिमी विचारधाराओं के साथ उसकी तुलना पर भी विचार-विमर्श हुआ।
सत्र के दौरान डेमेंद्र पिपरिया, सविता चंद्रा, डॉ. एल. प्रकाश राव, पूर्वी तिवारी एवं अमृता पाठक ने अपने-अपने विषयों की प्रस्तुति दी। प्रतिभागियों ने मीडिया, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक बदलाव से जुड़े सवाल पूछे, जिन पर वक्ताओं ने विस्तार से जवाब दिया।




