छत्तीसगढ़

थाने में शब्द नहीं, इशारे गूंजे… DCP दीपमाला कश्यप ने कहा… तुम बोल नहीं सकते तो क्या…हम तुम्हारी खामोशी पढ़ना सीखेंगे!

रायपुर। संकेत से संवाद – संवाद से समाधान शब्द नहीं, संकेत बोलेंगे और पुलिस समझेगी! राजधानी में हुआ वो, जो पहले कभी नहीं हुआ पुलिस कमिश्नरेट ने आज एक बार फिर साबित कर दिया कि वर्दी सिर्फ सख्ती नहीं, संवेदनशीलता का दूसरा नाम भी है।

आँखें नम और दिल गदगद ;-

पुलिस आयुक्त डॉ. संजीव शुक्ला के विजन “संवाद से समाधान” के तहत नॉर्थ जोन में एक ऐसा कार्यक्रम हुआ जिसने सबकी आँखें नम और दिल गदगद कर दिया।

112 पर मदद कैसे मांगेगा ?

सवाल सीधा था – अगर कोई बच्चा बोल ही नहीं सकता, तो 112 पर मदद कैसे मांगेगा? थाने में अपनी तकलीफ कैसे बताएगा? इसी सवाल का जवाब बनकर आया नॉर्थ जोन का यह ऐतिहासिक कदम।

वर्दी ने सीखी हाथों की भाषा!

पहली बार DCP नॉर्थ जोन श्रीमती दीपमाला कश्यप के नेतृत्व में नॉर्थ जोन के सभी थानों के विवेचकों को कॉपी-किताब नहीं, Sign Language सिखाई गई।

ट्रेनर्स ने पुलिसकर्मियों को बताया कि अगर कोई मूक-बधिर बच्चा अपराध या हादसे का शिकार होता है तो उसके कांपते हाथों, उसकी आँखों के इशारों को कैसे पढ़ना है। अब संवाद की दीवार इंसाफ में रुकावट नहीं बनेगी।

इस मौके पर एडिशनल DCP आदित्य पांडे, ACP पंडरी कृष्ण कुमार चंद्राकर, ACP उरला सुश्री पूर्णिमा लामा और कोपलवाणी से पद्मा शर्मा मौजूद रहीं।

बच्चे पहली बार पहुंचे पुलिस के दरवाजे :-

इसके बाद जो हुआ वो सबसे खूबसूरत पल था। कोपल वाणी स्पेशल स्कूल, सेमरिया के नन्हे-मुन्ने बच्चे DCP ऑफिस पहुंचे।

शुरुआत में थोड़े सहमे हुए, लेकिन जब DCP मैडम दीपमाला कश्यप ने खुद सांकेतिक भाषा में उनसे बात की – “डरो मत, पुलिस आपकी दोस्त है” – तो बच्चों के चेहरे खिल उठे।

बच्चों ने इशारों में ही अपनी दुनिया, अपने सपने पुलिस को बताए और पुलिस ने भी इशारों में ही उन्हें भरोसा दिया।

बच्चों ने DCP ऑफिस और फिर थाना पंडरी का भ्रमण किया। उन्हें सरल भाषा में समझाया गया कि मुसीबत में पुलिस को कैसे बुलाना है, थाना कैसे काम करता है।

हुनर को मिला सम्मान, आत्मनिर्भरता को सलाम ;-

इस कार्यक्रम का सबसे दिल छू लेने वाला हिस्सा था बच्चों की प्रदर्शनी। इन बच्चों ने अपने हाथों से जो पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट और हैंडमेड प्रोडक्ट्स बनाए थे, उन्हें देखकर अधिकारी भी हैरान रह गए।

ये सिर्फ कला नहीं, उनके आत्मनिर्भर बनने का सपना था। और रायपुर पुलिस ने सिर्फ ताली नहीं बजाई – अधिकारियों ने जेब से पैसे निकालकर उन उत्पादों को खरीदा।

एक लाइन में बड़ा संदेश :-

“संवाद केवल शब्दों से नहीं होता। अगर कोई बच्चा बोल नहीं सकता, तो यह पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह उसके संकेतों को समझना सीखे। कोई भी बच्चा सिर्फ इसलिए पुलिस की मदद से वंचित न रहे क्योंकि वह बोल नहीं सकता।”

ये सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, रायपुर पुलिस का वादा है – सुरक्षा सबके लिए, संवाद हर किसी से।

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