Breaking News

संघर्ष अब दिखने लगा है…राष्ट्रीय ढांचे के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह…

रायपुर l भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ संविधान की सर्वोच्चता और कुछ समूहों की विचारधारात्मक आक्रामकता के बीच संघर्ष अब स्पष्ट रूप में दिखने लगा है। यह समस्या किसी धर्म-विशेष के अनुयायियों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो अपने धार्मिक या वैचारिक ग्रंथों को देश, समाज, राष्ट्र और संविधान से ऊपर रखने की घोषणा करते हैं। संविधान भारतीय नागरिकता का आधार है, और नागरिकता स्वयं तभी सार्थक होती है जब नागरिक राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानता है। दुर्भाग्य यह है कि अब कुछ संगठित समूह खुले तौर पर घोषणा करने लगे हैं कि उनके लिए शरिया या उम्मा की निष्ठा भारतीय संविधान से पहले है। यह घोषणा केवल धार्मिक भावना नहीं—यह राष्ट्रीय ढांचे के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह है।

इस प्रकार की विचारधारा धीरे-धीरे अपराधों को वैधता देने का खतरनाक माध्यम बन जाती है। जब किसी कट्टर नेटवर्क के भीतर अपराधी मानसिकता को “कौमी कर्तव्य” कहकर समर्थन दिया जाता है, तब वह अपराध सामान्य आपराधिक हरकत नहीं रह जाता; वह संगठित सामाजिक हिंसा बन जाता है। भीड़ हिंसा, दंगे, पत्थरबाजी, आतंकवादियों के लिए खुला समर्थन, और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले आंदोलन इसी मानसिकता की उपज हैं। यदि यह वातावरण बढ़ता रहा तो अराजकता केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और भौगोलिक स्तर पर भी देश को कमजोर कर देगी। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि किसी भी राष्ट्र में जब कानून से ऊपर किसी वैचारिक पहचान को बढ़ावा मिलता है, तो राष्ट्र अंततः विघटन के मार्ग पर चल पड़ता है।

यहाँ पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसे नागरिकों के लिए समाधान क्या होना चाहिए? क्या देश से निष्कासन या फाँसी जैसे कठोर दंड की आवश्यकता है? या कोई ऐसा उपाय है जो राष्ट्र को भी सुरक्षित रखे और लोकतंत्र की मर्यादा भी बनाए रखे? यह समझना आवश्यक है

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button