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सुषमा के स्नेहिल सृजन… रिश्तो की डोर

रिश्तों की डोर,
सिर्फ़ विश्वास से बंधती है।
एक बार टूट जाए,
तो जोड़ने में,
पूरी उम्र बीत जाती है।
सपनों की दुनिया,
*रंगीन लगती है।*
*पर जागते ही,*
*यथार्थ का आईना,*
*सच दिखा देता है।।*
धूप का ताप,
*कभी तपन देता है।*
*तो कभी वही धूप,*
*’सुषमा’ जीवन का,*
*स्रोत बन जाती है।।
*समय की चाल,*
*कभी धीमी, कभी तेज़,*
*पर कोई रोक नहीं सकता।*
*उसके बढ़ते क़दम,*
*एक पल में खुशियाँ तो एक पल में,
*चिन्ताएँ बढ़ा सकती है।।




